Friday, November 8, 2013

Nishaan Baqi haiin!

गुज़र गई सुब्हो उल्फत के अभी तो शाम बाकि है !
दुवाएं  दिल से ना तू  कर के अभी तो जान बाकि  है !!

दो गज़ ज़मीन  ना मिली और दीदार तुम  ना हूवा !
सबर तो कर ऐ अहले क़ाफ़िला अभी तो नफ्से रवां बाक़ी है !!

मैं बत् तराशों  तस्वार के और तूं  बिखरे उन को !
ना आज़मा तूं मेरे कोल को के अभी तो आन  बाकि  है !!

ना मिल तूं  मुज को मेरे सकूं के मैदानों  मैं!
औजर्ड गया है सारा जहाँ फिर भी उम्मीद बाकि है !!

गुम्माम तुम को भुलाने कि वह कुष्षैं तो करे !
निशान हम तो मिटाया  ज़माने ने मगर अभी भी नक़श इ हम बाक़ी है!!

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